Wednesday, November 21, 2012

सिल्क,समाज और विद्या बालन





औरत अपनी सूरत और सीरत में सात पर्दों के अवगुंठन में छिपी रहे, तभी अच्छी लगती है- ऐसी मान्यता सदा से रही है। बादलों के पीछे से छन कर आती नरम धूप की तरह वह लोगों को सुकून दे, अपने मंद स्मित से पुरुषों को मुग्ध कर दे और अपनी प्रतीक्षा में उन्हें आकुल-व्याकुल कर दे- उससे ऐसी ही अपेक्षा रहती है । चिलचिलाती धूप और आँखों को चौंधिया देने वाली रोशनी सी वह आपके बीच आ ठहरे तो पुरुष उसके दामन से बँधता नहीं बल्कि किसी और छाँव की तलाश में निकल जाता है । सिल्क स्मिता ऐसी ही एक चौंधिया देने वाली रोशनी थी जिसने समाज और ग्लैमर की दुनिया के सारे नियमों को नकार दिया और समाज ने उसे।  जाहिर है कि जब मैंने अपने परिवार के साथ ‘डर्टी पिक्चर’ देखने की इच्छा व्यक्त की तो कोई सकारात्मक उत्तर नहीं मिला।  इसके पहले सिल्क को मैंने ‘सदमा’  फिल्म में देखा था लेकिन इसमें उसके बेबाक अभिनय ने उसे आलोचना के घेरे में कैद कर दिया।  ‘सदमा’ वर्षों तक याद रही लेकिन सेक्स के खुले प्रदर्शन ने सिल्क को भुला दिया हालाँकि उन दिनों का खुलापन फिर भी काफी दबा-ढँका था, लेकिन सेक्स तब आज की तरह रोजमर्रा के खाने में परोसा जानेवाला लज़ीज़ स्वाद नहीं था- मध्यमवर्ग के बीच सिल्क जैसी औरतों के किस्से वर्जित थे।
लोग कहते हैं- नाम में क्या है! मुझे लगता है, नाम में ही सब कुछ है - नाम अर्थात शब्द अर्थात चरित्र।  लेकिन सिल्क के बारे में अपने सीमित ज्ञान को और बढ़ाने की खातिर मुझे यह फिल्म नहीं देखनी थी, बल्कि जानना था अचानक उठे हुए गुबार की तरह अपने आस-पास की हलचल के कारण को समझने के लिए। लेकिन हुआ उल्टा - औरों की तरह मैं भी एक प्रवाह में बह गई। मन में सोचा- आखिर हुआ क्या है विद्या को? अचानक यह परिवर्तन! परिणीता की सौम्य,शांत कोमल नारी-चरित्र के बाद अब यह!!
अंतत: चाह कर भी मैं इस फिल्म को सपरिवार थियेटर में न देख सकी।  मेरा परिवार उसके नाम को लेकर ही उलझा रहा और मुझे अकेले जाने का हौसला ही न हुआ।  मैं भी ‘लोग क्या कहेंगे?-इस प्रश्न को लेकर ऐसी उलझी कि मौका ही खो बैठी।

अचानक एक दिन बैठे-बिठाए केबल पर उसे देखने का मौका मिला।  सिल्क की कहानी तो जानी-पहचानी थी, पर विद्या बालन का उस चरित्र में घुल-मिल जाना मुझे रोमाँचित कर गया। वैसे भी मैं उसकी फैन थी और उसकी पहली फिल्म ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। ‘परिणीता’ में नायिका के लिये जिस विशुद्ध बंगाली कमनीयता और आभिजात्य भाव की आवश्यकता थी,वह उसमें नाप-तोल कर तो थी ही, चरित्र के साथ भी उसने पूरा न्याय किया था।  उसके बाद कई फिल्मों की सीढ़ियाँ चढ़ कर ‘डर्टी पिक्चर’ को स्वीकारना अवश्य ही एक चुनौती के लिये रहा होगा- यही समझी। अनेक सवाल मेरे मन में उठ खड़े हुए और मेरा मन भीतर ही भीतर उनके हल खोजने लगा।

सिल्क के किरदार में अभिनय के लिये अपार सम्भावनाएँ थीं। उसकी फिल्मी महत्वाकाँक्षाएँ, उन्हें पूरा करने के लिये किसी भी तरह का समझौता, उसके साथ पुरुष-वर्ग का बर्ताव, उनके षड्यंत्र, सिल्क का बेबाक-बेपर्दा व्यवहार, फिल्मी-समाज में उसका शोषण, प्रतिक्रिया में सिल्क की निराशा और अंत में हताशा के कारण उसकी आत्महत्या- कहना चाहिए, काफी रेंज था और उतनी ही आशंकाएँ थीं फ्लॉप होने की।

इस चरित्र को महज एक ग्लैमरस, स्कैंडलस ऐक्ट्रेस का नाम देना इसलिए उचित नहीं, क्योंकि वह पर्दे की नायिका थी! ऐसी कहानियाँ मात्र चलती-फिरती तस्वीरें नहीं हैं, बल्कि आज के युग में कई सवाल उठाती हैं- वर्षों पहले की ये जिंदगियाँ अपने ही हाथों दबोची अपनी जीवन-गाथा नहीं कहतीं, समाज के चेहरे का मुखौटा भी नोच डालती हैं।  जरा सोचिये, पुरुष कब नारी को चुनौती के रूप में अपना सका है?  '' तू है मेरी फैंटेसी!''-  कहकर पुरुष ने उसके लिये एक सीमा-रेखा खींच रखी है। ऐसा कहकर वह स्त्री को एक खास घेरे में बिठा देता है, खास नजरिये से देखना पसंद करता है। सिल्क ने इस बने-बनाये घेरे को तोड़ कर जब अपने नियम बना डाले तो उसका फैंटेसी वाला रूप टूटता चला गया और उसकी कीमत फिल्मी -समाज में दो कौड़ी की रह गई ।


आज सिल्क की इमेज तय करने के पहले उसके व्यक्तित्व की नये ढंग से मीमांसा करनी होगी। उसे सेक्स-सिंबल के चौखटे में कसने के बदले समाज की उन परिस्थितियों की ओर भी देखना होगा ,उचित-अनुचित तथ्यों की ओर भी नजर घुमानी होगी जिनके कारण सिल्क गढ़ी गई।
जैसे ही स्त्री पुरुषों की प्रतियोगिता में बराबर आ खड़ी होती है, दोनों में द्वंद्व-युद्ध छिड़ जाता है, समाज के बनाये मापदंड हिलने लगते हैं। पुरानी पीढ़ी के प्रति नारी के विद्रोह और नई पीढ़ी के प्रति उसकी जिम्मेदारियों के प्रसंग छिड़ने लगते हैं। सिल्क जैसे बेबाक व्यक्तित्व को समाज के बने-बनाये फ्रेम में फिट करना पुरुषों और स्त्रियों दोनों से काफी उदारता की माँग करता था, लेकिन यह सम्भव न हो सका। समाज में सामान्य वर्ग की स्त्री-जाति की मान्यताओं को नकार कर और फिल्मी-जगत के आतुर पुरुषों  के करीब आकर उसने अपने-आप को एक ऐसे वर्ग में बाँध लिया, जिसमें विरोध का स्वर मुखर था और सर्वसामान्य को मान्य नहीं था।

विद्या बालन की साफ-सुथरी छवि इस चरित्र का बोझ उठा सकी है या नहीं,यह जानने के लिए मैंने यह फिल्म नहीं देखी। सच पूछिये तो फिल्म देखकर ही मैं इन सारी बातों को सोचने पर मजबूर हो गई।
आज हमारे समाज में परिवर्तन की स्थिति स्पष्ट है। उपभोक्तावादी संस्कृति के साथ-साथ वर्षों पहले खोया हुआ बौद्धिकतावाद भी अपनी जगह तलाशने को मचल रहा है। जटिल होने के बावजूद यह स्थिति काफी आशावादी है। यह नया नजरिया अंधेरे को देख कर आँखें नहीं मूँद लेता, किंचित उदार होने की चेष्टा करता है। अंधेरे के पीछे की सच्चाई को जानने की कोशिश करता है, उसे दूर करने में जुट जाता है। अंधेरी रातों में अपने दुधमुँहे बच्चे को फुटपाथ पर सुला कर चिथड़ों में लिपटी औरत जब उसके मुँह में निवाला डालने की खातिर अपना सब कुछ दाँव पर लगा कर खुद अंधेरे में खो जाती है, तो उस स्थिति को समझने वाला यही आज का मनुष्य, खुद से और समाज से यह अपेक्षा रखता है कि उँगली समाज की ओर उठे, न कि प्रताड़ित की ओर। आज का यही मानव अंधेरे में खोये अनेक चरित्रों और तथाकथित सेक्स-सिंबल्स के मनोविज्ञान और उनके आस-पास की सच्चाइयों से परिचित कराता है। आशा है,इसी बौद्धिक मानव की विश्लेषक प्रवृति सिल्क के चरित्र के साथ भी न्याय करेगी।
फिल्म के अंतिम दृश्य में जब सिल्क जीवन के अनेक पड़ावों की प्रदक्षिणा कर हताश हो चुकी होती है और अपने-आप को सदा के लिये नींद के आगोश में सुला चुकी होती है, तो वह अपने पीछे समाज के विकृत सत्य के सन्नाटे को छोड़ जाती है।  सच पूछिये तो यह सन्नाटा ही अनेक प्रश्नों का उत्तर है।  सामान्य समाज और ग्लैमर के फासले  स्पष्ट करती है यह चुप्पी!

आये दिन समाज के बने-बनाये कटघरे में कैद औरतें अपने आस-पास की परिस्थितियों के दबाव से हताश होकर अपने-आप को मौत के हवाले कर देती हैं। अखबारों और टी.वी. के माध्यम से उनकी असमय समाप्त जीवन-यात्रा के प्रति हमें  क्षणिक सहानुभूति भी होती है,पर ऐसी ही घटनायें यदि किसी ग्लैमर की दुनिया से जुड़ी शख्सियत के साथ हो तो हमारे होठों के किनारे विद्रूप से टेढ़े हो जाते हैं, भ्रू-भंगिमाओं के बीच छिपी हुई मुस्कान व्यंग्य का संदेश बिखेरने लगती है, मानो कह रही हो-अच्छा हुआ! जैसा किया,वैसा पाया। तब वह खबर महज एक स्कैंडल बन के रह जाती है और ऐसे लोग समाज से बहिष्कृत कर दिये जाते हैं।
इन मान्यताओं को तोड़कर आज जब दुनिया एक नये और परिवर्तित रूप में आने का साहस कर रही है- विकृतियों के पीछे के कारण को समझने की कोशिश कर रहीहै-एचआईवी,सेक्स और कंडोम की जानकारी देने का साहस कर रही है तो अनायास ही सिल्क जैसे चरित्र लेक्चर-रूम में प्रवेश पा चुके हैं, जहाँ ऐसे चरित्रों के मनोविज्ञान, समाज के मनोविज्ञान, एक दूसरे पर उनकी प्रतिक्रिया  और नैतिकता के नये अर्थ की नये सिरे से मीमांसा की जा रही है। शायद यही कारण रहा होगा कि विद्या बालन ने इस चरित्र को तथाकथित सेक्स सिंबल, ग्लैमर और स्कैंडल  जैसे लेबलों से अलग रखकर उसके मानवीय  पक्ष को अपनाने की चुनौती स्वीकार की होगी। जो भी हो, उसके प्रयासों से सिल्क एक बार फिर जीवित हो गई। दूसरों की नहीं कह सकती,पर मुझे अनजाने में लगा कि थियेटर से निकलने वालों को विद्या बदलाव का एक पर्चा थमा रही हो जिसमें लिखा हो-रुकिए! महज सौ-दो सौ रुपयों के टिकट खरीद कर सिर्फ ‘उ ला ला’ गुनगुनाते हुए थियेटर से निकलना ही आपका काम नहीं है,थोड़ी जिम्मेदारी तो बनती है आपकी अपना नज़रिया बदलने की!!!

वीणा सिंह

Tuesday, November 20, 2012

रेशम के गुच्छे





सब देखा - गुम्बद, मेहराब, परकोटे
धूप आकृतियाँ बुनती
छत पर आलसी बिल्ली सी
पंजों के जोर उचकती
यहाँ-वहाँ पर बिखरे बेबाक कहकहे चुनती

सब देखा- सूने गह्वर-विवर
रहस्यमय संकेतों में घिर
कपोतों के संग युगल
युगलों की शाश्वत भाषा
मन की ऊँची प्राचीरें
अगम्य-बोध नदी तीरे
गढ़ती नई परिभाषा!

देखा अंधेरे का चुपके
प्रकाश द्वार पर विलयन
तारों से जड़े चंदोवे में
नयनों का उन्मीलन
देखा कोहनी पर झुका चाँद
प्रांगण में झरती चाँदनी
मौसम के संग हो एकतान
गुनगुन करती रागिनी
रागों में घुलती यामिनी

देखा भित्तियों दीर्घाओं में
कलाकृतियों का इतिहास अमर
अनवरत कोलाहल के बीच
अगरु-धूम सा मंत्र मुखर
अन्त:सलिला सी पाटों में
कितनी बातें मौन रहीं
कितनी सदियाँ चुपचाप बहीं।

सब देखा
दिन-रात की बुनी चटाई पर
मौसम को बैठे-बैठे
गिनते रहना पहरों को
रेशम के गुच्छों में बंधकर
आती जाती लहरों को

सीमाबंदी के पार खड़ी
जब कभी अकेली हो जाऊँ
विह्वल उदास हो रात बड़ी
तब चुपके से एकांत में
रेशम के गुच्छे खोल-खोल
मैं अपना दिल कुछ बहलाऊँ
मैं अपना दिल कुछ बहलाऊँ !

वीणा सिंह